Wednesday, June 19, 2013
शमा जल रही थी, मोम पिघल रहा था,
पत्ते झड रहे थे, ओस छा रही थी,
तेज धूप गर्म हवा, पसीना बह रहा था,
इमान डहे रहा था, इंसानियत इन्सानियत रो रही थी।
परवाने मचल रहे थे, कलियाँ खिल रही थी,
हवा यूँ चल रही थी, मस्ताने झूम रहे थे,
क्या समां में खुशबु थी,गम न फ़िक्र सभी हंस रहे थे.
सुबह रोशन थी,रात अँधेरा था,
ख़ुशी गुलशन में थी, गम सेहरा था,
ममता की ऊब थी, नफरत की ठंड थी,
जिंदगी का आंचल था, मौत का कफ़न था।
जिसे मै शुरुआत समझा वही मेरा अंत था,
और मेरा अंत मेरे लिए अनंत था सुख में दुःख की गहराई थी,
दुःख में खुशियों की ऊंचाई थी,
मै चलित था पर अचल में अड्ग था।
जयकल्प।
Wednesday, June 5, 2013
कभी गमके करीब आने की आहट ,
कभी अन्जानी मुश्किलोकी घबराहट ,
सोचता हूँ कोई सुकून तो मिले ,
सहेलाती है तब किसीके हाथोंकी गर्माहट
मै जनता हूँ मेरे पास हो तुम हमेशा हमेशा ।
कभी उलजता हूँ दुनिया भरके रिश्तोमें,
दू:ख आते है कभी साथ तो कभी किश्तोमे,
क्या करू कुछ भी समज नहीं आता,
कुछ कमीसी नजर आती है फरिश्तों में,
लेकिन मै जानता हूँ मेरे पास हो तुम हमेशा हमेशा।
गिरगिट की तरह मौसम ने रंग बदल डाले,
आधे भरे या आधे रिक्त सभी प्याले उंडेल डाले,
जिन्हें उड़ना सिखाया था हवाओं पर ,
उन्होनेही मेरे पंख कुचेल डाले
फिरभी मै जानता हूँ मेरे पास हो तुम हमेशा हमेशा ।
जानता हूँ और भी तूफान आयेंगे ,
हो सकता है मेरा सबकुछ ले जायेंगे ,
मिट जाऊंगा वक्त के सितम से कही,
बची राख़ को गर्दिश में उड़ायेंगे,
तब भी मै जनता हूँ मेरे पास हो तूम हमेशा हमेशा ।
जयकल्प ।
कभी अन्जानी मुश्किलोकी घबराहट ,
सोचता हूँ कोई सुकून तो मिले ,
सहेलाती है तब किसीके हाथोंकी गर्माहट
मै जनता हूँ मेरे पास हो तुम हमेशा हमेशा ।
कभी उलजता हूँ दुनिया भरके रिश्तोमें,
दू:ख आते है कभी साथ तो कभी किश्तोमे,
क्या करू कुछ भी समज नहीं आता,
कुछ कमीसी नजर आती है फरिश्तों में,
लेकिन मै जानता हूँ मेरे पास हो तुम हमेशा हमेशा।
गिरगिट की तरह मौसम ने रंग बदल डाले,
आधे भरे या आधे रिक्त सभी प्याले उंडेल डाले,
जिन्हें उड़ना सिखाया था हवाओं पर ,
उन्होनेही मेरे पंख कुचेल डाले
फिरभी मै जानता हूँ मेरे पास हो तुम हमेशा हमेशा ।
जानता हूँ और भी तूफान आयेंगे ,
हो सकता है मेरा सबकुछ ले जायेंगे ,
मिट जाऊंगा वक्त के सितम से कही,
बची राख़ को गर्दिश में उड़ायेंगे,
तब भी मै जनता हूँ मेरे पास हो तूम हमेशा हमेशा ।
जयकल्प ।
दरवाजेकी दरार से
एक किरण अन्दर आ गई ;
न दस्तक न आवाज,
फिर भी हमें जगा गई।
अँधेरे इस कमरेको
रोशन करने आई थी ;
धुल के नन्हे कणोंको,
न जाने क्यों चमका गई।
हाथोकी परछाइयोसे
खेलता था मै कभी ;
लांघकर बचपनकी रेखा ;
मेरे जहन पे छा गई।
शायद किसीके आनेका
पैगाम उसके पास था।
जिसने भेजा था उसे ;
उसकी यह अदा भी भा गई।
अब आई है तो रोक लुं,
समेट लुं अपने हाथोमे।
बन गया एक रिश्ता ;
मुजमे वह समा गई।
जयकल्प।
एक किरण अन्दर आ गई ;
न दस्तक न आवाज,
फिर भी हमें जगा गई।
अँधेरे इस कमरेको
रोशन करने आई थी ;
धुल के नन्हे कणोंको,
न जाने क्यों चमका गई।
हाथोकी परछाइयोसे
खेलता था मै कभी ;
लांघकर बचपनकी रेखा ;
मेरे जहन पे छा गई।
शायद किसीके आनेका
पैगाम उसके पास था।
जिसने भेजा था उसे ;
उसकी यह अदा भी भा गई।
अब आई है तो रोक लुं,
समेट लुं अपने हाथोमे।
बन गया एक रिश्ता ;
मुजमे वह समा गई।
जयकल्प।
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