दरवाजेकी दरार से
एक किरण अन्दर आ गई ;
न दस्तक न आवाज,
फिर भी हमें जगा गई।
अँधेरे इस कमरेको
रोशन करने आई थी ;
धुल के नन्हे कणोंको,
न जाने क्यों चमका गई।
हाथोकी परछाइयोसे
खेलता था मै कभी ;
लांघकर बचपनकी रेखा ;
मेरे जहन पे छा गई।
शायद किसीके आनेका
पैगाम उसके पास था।
जिसने भेजा था उसे ;
उसकी यह अदा भी भा गई।
अब आई है तो रोक लुं,
समेट लुं अपने हाथोमे।
बन गया एक रिश्ता ;
मुजमे वह समा गई।
जयकल्प।
No comments:
Post a Comment