Wednesday, June 5, 2013

दरवाजेकी दरार से
एक किरण अन्दर आ गई ;
न दस्तक न आवाज,
फिर  भी  हमें  जगा  गई।

अँधेरे  इस  कमरेको
रोशन  करने  आई  थी ;
धुल के नन्हे कणोंको,
न जाने क्यों चमका गई। 

हाथोकी  परछाइयोसे
खेलता था मै कभी ;
लांघकर बचपनकी रेखा ;
मेरे जहन पे छा गई।

शायद किसीके आनेका
पैगाम   उसके   पास  था।
जिसने भेजा था उसे ;
उसकी यह अदा भी भा गई। 

अब आई है तो रोक लुं,
समेट लुं  अपने हाथोमे।
बन गया एक रिश्ता ; 
मुजमे वह समा गई।
             
            जयकल्प।

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