Wednesday, June 19, 2013
शमा जल रही थी, मोम पिघल रहा था,
पत्ते झड रहे थे, ओस छा रही थी,
तेज धूप गर्म हवा, पसीना बह रहा था,
इमान डहे रहा था, इंसानियत इन्सानियत रो रही थी।
परवाने मचल रहे थे, कलियाँ खिल रही थी,
हवा यूँ चल रही थी, मस्ताने झूम रहे थे,
क्या समां में खुशबु थी,गम न फ़िक्र सभी हंस रहे थे.
सुबह रोशन थी,रात अँधेरा था,
ख़ुशी गुलशन में थी, गम सेहरा था,
ममता की ऊब थी, नफरत की ठंड थी,
जिंदगी का आंचल था, मौत का कफ़न था।
जिसे मै शुरुआत समझा वही मेरा अंत था,
और मेरा अंत मेरे लिए अनंत था सुख में दुःख की गहराई थी,
दुःख में खुशियों की ऊंचाई थी,
मै चलित था पर अचल में अड्ग था।
जयकल्प।
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