Saturday, November 3, 2012


उत्क्रांति

वक़्त को वक्तसे बातें करते हमने सुना था,
सोच अगर साथ चलती तो बहोत अच्छा होता,
पर ऐसा न हुवा........(२)

सबकुछ बदल गया, कभी राही बदल गए,
जरुरत थी एक कदम बढानेकी, हाँथ थामने की,
वक़्त की नजाकत पर गौर फरमाने की,
पर ऐसा न हुवा........(२)
सोच थम गई, उसी राह से हम गुज़र गए,
पर जाते जाते सोचको सोचनेपर मजबूर कर गए,
वक़्त को वक़्तसे.........१

अब नई सोच व् नए वक्तने जनम लिया है,
दोनों साथ निभाने की कोशिश में जुटे है,
नया रूप नया रंग मनभावन है,
अब ऐसा ही हुवा......(२)
कल का सूरज नई रोशनी के साथ छा जाएगा,
और कल का अन्धेरा क्षितिज में समा जाएगा,
वक़्त को वक्तसे..........२

आनेवाली सोच वक्तसे भी तेज़ होगी,
चाँद तारों के साथ साथ ग्रहमंडल से भी आगे होगी,
पलक ज़पकनेकी देर, सोच नया अवतार धारण करेगी,
अब ऐसाही होगा.......(२)
पंचमहाभूतोंपर उसीका आधिपत्य होगा,
सोच मुस्कराएगी और यही सत्य होगा,
वक़्त को वक्तसे.........३
— at अविकल्प .

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